सोमवार, 17 अगस्त 2009

दरोगा रुस्तम अली

दरोगा रुस्तम अली अपने समय का अत्यंत काइयाँ, बल्कि आदमखोर क़िस्म का पुलिस अधिकारी रहा था। जहाँ भी रहा, उस क्षेत्र के अपराधी उसके नाम से यों काँपते रहे, जैसे आँधी में वृक्ष के पत्ते काँपने लगते हैं। पुलिस की भाषा में थर्ड डिग्री किस बला का नाम है और उसका प्रयोग किस प्रकार किया जाता है, शायद ही रुस्तम अली से अधिक कोई इस रहस्य को जानता हो। जब तक स्कूल में रहा, रुस्तम अली थर्ड डिग्री से ऊपर कभी नहीं गया और जबसे पुलिस की नौकरी में आया, अपनी परंपरा के अंतर्गत थर्ड डिग्री का ही प्रयोग करता रहा है लेकिन एक दिन सुनने में आया कि दरोगा रुस्तम अली का हृदय- परिवर्तन हो गया है, यों तो अब हमें किसी छोटे या बड़े परिवर्तन से आश्चर्य नहीं होता, क्योंकि हमारा देश पिछले कई दशकों से निरंतर परिवर्तन व धर्म-परिवर्तन आदि के बाद अब राजनीतिक दल, पदयात्रा व रथयात्रा छोड़कर परिवर्तन-यात्रा आयोजित करने पर उतारू हो गए हैं, पर इन सारे ही परिवर्तनों में हमें दरोगा रुस्तम अली के हृदय-परिवर्तन की घटना पर आश्चर्य हुआ। क्योंकि हमने सुन रखा था कि पुलिस और परिवर्तन में इसी प्रकार का वैर है, जैसा बाघ और बकरी में होता है। न तो बाघ ही अपना स्वभाव बदलता है और न बकरी ही अपनी प्रवृत्ति। किंतु दरोगा रुस्तम अली ने अचंभा कर दिखाया और अपना ऐसा ग़ज़ब का हृदय-परिवर्तन किया कि हम ही क्या, पूरा शहर सुनकर दंग रह गया।
हुआ यों कि भाई मुंगेरीलाल जी जब पहली बार जनसेवक बने, यानी एक वोट के रिकार्ड-तोड़ बहुमत से जीतकर संसद नामक देश की सबसे बड़ी पंचायत में पहुँचे तो सबसे पहले उन्होंने पुलिस का ओवर हॉल करने की ठानी। बहुत सुन रखा था मुंगेरीलाल जी ने कि दरोगा रुस्तम अली अभियुक्तों, आरोपियों के साथ अत्यंत क्रूर और अमानवीय व्यवहार करता है। वह किसी को पकड़ता है, तो उसको जेल भेजे बिना छोड़ता ही नहीं लेकिन पकड़ने से जेल भेजने के बीच अभियुक्त पर जो बीतती है, वह या तो अभियुक्त ही जानता है या दरोगा रुस्तम अली। हो सकता है थोड़ा-बहुत ऊपरवाला भी जानता हो, लेकिन ज़्यादा नहीं, क्योंकि अपने थर्ड डिग्रीवाले करतबों को दरोगा रुस्तम अली इतना गुप्त रखता था कि कानों-कान किसी को भनक ही नहीं लग पाती थी। कभी-कभी पुलिस हिरासत में हुई किसी अभागे अभियुक्त की मृत्यु हो जाए तो पता चलता था कि दरोगा रुस्तम अली ने अपनी रुस्तमी दिखाते हुए कुश्तम-कुश्ती में एक शातिर अभियुक्त को चित कर दिया, यानी उस बाँस को ही तोड़-मोड़कर ठिकाने लगा दिया, जिससे बाँसुरी बन सकती थी और बजाई जा सकती थी।
इत्तेफ़ाक यह था कि अपराधों की बंसी बननेवाले जितने बाँस थे, वे सब थे मुंगेरीलाल जी के पाले-पोसे। तो साहब हुआ यह कि एक वोट के भारी बहुमत से जीतकर भाई मुंगेरीलाल जी जैसे ही संसद से शपथ लेकर लौटे, जा धमके पुलिस थाने में। देखा दरोगा रुस्तम अली ने उसके चुनाव-क्षेत्र से पकड़कर लाए गए एक शातिर अभियुक्त को छत के पंखे से टाँग रखा है और नीचे से आग जलवाकर उसे हाँडी की तरह पकवा रहा है। भाई मुंगेरीलाल जी ने देखा तो उनकी सहनशक्ति जवाब दे गई। सोचा, ऐसी भयंकर क्रूरता! राक्षस भी नहीं करते होंगे, ऐसा अत्याचार तो।
धड़ाम से अपने-आपको कुर्सी पर गिराते हुए भाई मुंगेरीलाल बोले, 'शर्म नहीं आती, रुस्तम अली। यह क्या शैतानी कर रहे हो। आदमी हो कि जानवर! कान खोलकर सुन लो, हमारे रहते यह सब नहीं चलेगा अब।'
रुस्तम अली ने पहले पंखे से लटके हुए अभियुक्त की ओर देखा और फिर भाई मुंगेरीलाल जी की ओर। कोई उत्तर सोच ही रहे थे कि भाई मुंगेरीलाल जी वन वे ट्रेपि क की तरह फिर शुरू हो गए-
'तुम जानते हो रुस्तम अली, अब समय बदल गया है। यह आज़ाद भारत है। अब पुलिसवालों को अँग्रेज़ों के ज़मानेवाला चरित्र बदलना होगा। यह जंगलीपन छोड़ना होगा। सभ्यता और शिष्टाचार सीखने होंगे। नहीं सीखोगे तो एक मिनट में वर्दी उतरवाकर रखवाली जाएगी। किस अधिकार से तुमने इस बेचारे को पंखे से बाँधकर ऊपर लटकवा रखा है। कौनसा क़ानून ऐसा है, जो तुम्हें नीचे से आग जलाकर इसे भूनने की अनुमति देता है।
दरोगा रुस्तम अली अपनी तलवार मार्का मूँछों के बीच धीमे से हँसकर बोला, 'बात यह है एम.पी. साहब, यह साला बहुत शातिर किस्म का बदमाश है। पिछले दिनों रजवाहे के निकट जो बस लुटी थी, उसका मुख्य अभियुक्त यही था। पर साला न तो माल ही बरामद करा रहा है और न अपने सहयोगियों का नाम-पता बताने को तैयार है। इतना कहकर दरोगा रुस्तम अली को फिर जो ताव आया तो मुंगेरीलाल जी की उपस्थिति का लिहाज किए बिना उठा और लाठी से उसकी पीठ उधेड़ते हुए बोला, 'क्यों बे ....पिल्ले! बताता है कि नहीं बताता है! साला ....का खसम!'
मुंगेरीलाल जी ने यह दृश्य देखा तो उनका मन करुणा से भर गया। बोले, 'क्यों रे दरोगा रुस्तम अली, जो बात तुम डंडे के ज़ोर पर पूछ रहे हो, वह बात भलमनसाहत से भी तो पूछी जा सकती है। इसे तुरंत पंखे से खोलो, नहीं तो मैं गृहमंत्री से तुम्हारी शिकायत करूँगा, मिनट-भर में छटी का दूध याद दिला दूँगा, बच्चू।'
रुस्तम अली ने देखा कि एम.पी. साहब लावे की तरह फट पड़ने को तैयार हैं तो उसने चीखकर पहरे के सिपाही को आवाज़ दी। बोला, 'अभियुक्त को खोल दो और सम्मानपूर्वक इसे थाने के द्वार तक छोड़ आओ।'
पहरे के सिपाही ने आदेश की तामील की। मुंगेरीलाल जी कुर्सी से उठे। दरोगा रुस्तम अली से हाथ मिलाया। बोले, 'आज़ाद भारत में पुलिस को थोड़ा सभ्य तो होना ही चाहिए, अब आप किसी और वक़्त उसे बुलाएँ और दुलार-पुचकारकर पूछें। सब कुछ उगल देगा यह।'
मुंगेरीलाल जी थोड़ा रुके, फिर बोले, 'याद रखो रुस्तम अली, जब तक सीधी उँगलियों से घी निकल सकता हो, तब तक अपनी उँगलियों को टेढ़ा नहीं करना चाहिए। एक तुम हो कि अपनी उँगलियाँ ही सीधी नहीं करते हो कभी। टेढ़ी ही रखते हो।'
दरोगा रुस्तम अली भी एक काइयाँ था। बोला, 'अब अपनी उँगलियाँ सीधी ही रहेंगी एम.पी. साहब, टेढ़ी नहीं होंगी कभी। आप चिंता न करें जी।'
बात आई-गई हो गई। क्षेत्र में चर्चा चली कि दरोगा रुस्तम अली का हृदय-परिवर्तन हो गया है। अब थाने में किसी अपराधी पर कोई सख्ती नहीं हो रही है। अभियुक्तों को सम्मानपूर्वक बुलाया जाता है। सम्मानपूर्वक बिठाया जाता है। प्रेमपूर्वक पूछताछ की जाती है और अंत में सम्मानपूर्वक उन्हें रुखसत कर दिया जाता है। हर ऐसी घटना के बाद दरोगा रुस्तम अली अपनी केस डायरी (सी.डी.) में यह इबारत दर्ज करता है-
'एक 'शातिर' अभियुक्त को, जिसका नाम अमुक पुत्र अमुक है और जो अमुक स्थान का मूल निवासी है नामज़द रिपोर्ट के आधार पर अमुक स्थान से गिरफ्तार किया। अभियुक्त को थाने में लाकर आदरपूर्वक पूछताछ की गई। उससे करबद्ध होकर पूछा गया कि बंधुवर! अगर अमुक चोरी में जाने या अनजाने आपका हाथ रहा है तो आप निस्संकोच हमें बता दें। हम आपको कुछ नहीं कहेंगे, बल्कि एक गिलास गर्मा-गर्म दूध पिलाएँगे और चालान कर जेल की हवा खाने के लिए भेज देंगे, किंतु अभियुक्त अपराध से इंकार करता रहा। हमने उसे देसी शराब की एक थैली भेंट की, पट्ठा एक ही साँस में पूरी थैली चढ़ा गया, पर मुँह से कुछ नहीं फूटा। अतएव उसे नशे की हालत में झूमता-झामता थाने से जाने दिया गया।'
दरोगा रुस्तम अली की केस डायरी ऐसी ही घटनाओं से भरती चली गई। एक दिन इत्तेफ़ाक ऐसा हुआ कि सांसद मुंगेरीलाल जी के घर ही चोरी की वारदात हो गई।
मुंगेरीलाल जी के घर चोरी हुई तो वे दौड़े-दौड़े थाने आए। छूटते ही एक अदद रिपोर्ट दर्ज कराई। रिपोर्ट में एक लाख रुपये का माल चोरी हो जाने का दावा किया गया था। रिपोर्ट लिखकर भाई मुंगेरीलाल जी सीधे दरोगा रुस्तम अली के पास पहुँचे, पूरा माजरा उन्हें सुनाया।
दरोगा रुस्तम अली की आँखों में चोरी की बात सुनकर चमक-सी आ गई। बोला, 'पर एम.पी. साहब, यह एक लाख का माल आपके पास आया कहाँ से? जहाँ तक हमारी जानकारी है, चुनाव तो आपने अपनी हवेली बेचकर लड़ा था। फूटी कौड़ी तो रही नहीं थी आपके पास, फिर साल-भर के अंदर-अंदर!'
मुंगेरीलाल जी ने दरोगा रुस्तम अली की बात सुनी तो मारे ताव के लाल भभूका हो गए। बोले, 'तुम पुलिस दरोगा हो या इनकमटैक्स अधिकारी। अपने अधिकार-क्षेत्र से बाहर जाने की कोशिश मत करो, वर्ना हमसे बुरा कोई नहीं होगा, चौबीस घंटों के अंदर चोरी खुल जानी चाहिए, अभियुक्त गिरफ्तार हो जाने चाहिए तथा माल बरामद हो जाना चाहिए। नहीं तो बिस्तर बाँध लो और यहाँ से दफ़ा होने के लिए तैयार हो जाओ।'
दरोगा रुस्तम ने अली मुंगेरीलाल जी की धमकी सुनी तो डरा नहीं। बोला, 'एम.पी. साहब। घबराइए मत, अभी पकड़ता हूँ अभियुक्तों को, लेकिन आप ज़रा अपना शक-वक तो बताएँ, कौन हो सकता है आपके यहाँ चोरी में शामिल।'
मुंगेरीलाल जी ने संदेह व्यक्त किया, 'हमारा खयाल है, चोरी में वही अभियुक्त शामिल था, जिसे उस दिन तुमने पंखे से बाँधकर लटका रखा था। हमारे सूत्रों का कहना है कि चोरीवाली रात से पहलीवाली रात में वह थाने आया था। वह थाने में देखा गया है।'
ज़रूर देखा गया होगा मुंगेरीलाल जी, ज़रूर देखा गया होगा। हम इससे इंकार नहीं कर रहे हैं, कई बार अपराधी थाने की सुनगुन लेने चुपके से आ जाते हैं, यह सूँघने के लिए कि किस पुलिसकर्मी की ड्यूटी कहाँ लगाई गई है। पर आप चिंता न करें। अभी सब-कुछ हुआ जाता है चुटकी बजाते।
इतना कहकर दरोगा रुस्तम अली ने दो सिपाहियों को बुलाया और आदेश दिया की खचेडू को पकड़ लाओ। छंगा पुत्र खचेडू पकड़कर लाया गया।
दरोगा रुस्तम अली ने उसे अपने बराबर वाली कुर्सी पर जगह दी। विनम्रतापूर्वक उससे हाथ मिलाया। बोला, 'भाई छंगा जी महाराज, यह जो एम. पी. साहब बैठे हैं न, मुंगेरीलाल जी, रात इनके यहाँ एक लाख रुपए की चोरी हुई है। इनका खयाल है कि इस चोरी में आपका हाथ है। हम आपसे हाथ जोड़कर निवेदन करते हैं कि चोरी में शामिल अपने दीगर साथियों का नाम बताएँ, माल बरामद कराएँ और हमारे साथ एक कप चाय पीकर जेल चले जाएँ। इस सारी महरबानी के लिए हम आपके बहुत-बहुत आभारी होंगे।'
दरोगा रुस्तम अली की दिल को छू लेने वाली अपील सुनकर छंगा पुत्र खचेडू ठहाका मारकर हँसा। बोला, 'कैसी बात कर रहे हो दरोगा साहिब! हम और चोरी! वह दिन गए, जब हम यह नेक काम किया करते थे, अब तो हम गऊ हो गए हैं, गऊ।'
दरोगा रुस्तम अली ने एक दो बार और इसी तरह विनम्रतापूर्वक उससे चोरी का पता पूछा और फिर उसे सम्मान के साथ थाने से रुखसत कर दिया। उस दिन की तारीख में दरोगा ने अपनी केस डायरी में लिखा-
एक शातिर अभियुक्त छंगा पुत्र खचेडू को श्री मुंगेरीलाल जी एम.पी. के यहाँ चोरी के इल्जाम में पकड़ा, उससे प्रेमपूर्वक पूछताछ की, चाय आदि से उसकी खातिर की, पर वह नहीं खुला। जिस पर उसे थाने से बाइज़्ज़त रुखसत कर दिया गया।'
मुंगेरीलाल जी कई दिन तक थाने के चक्कर काटते रहे पर कुछ हुआ नहीं। दरोगा रुस्तम अली अभियुक्तों को पकड़ता रहा, छोड़ता रहा।
इस घटना को कई साल गुज़र गए, पर आज तक हम यह पै़ सला नहीं कर सके कि इनमें से कौन सही था, भाई मुंगेरीलाल जी या दरोगा रुस्तम अली। क्योंकि यह लोकतंत्र है ना, यह ऊँट की तरह है और इसकी कोई कल सीधी नहीं है।
डा. गिरिराजशरण अग्रवाल
16 साहित्य विहार, बिजनौर (उ.प्र.)
09368141411

1 टिप्पणी:

  1. ये सच है ..! Police पे , गधे पे बैठे तो क्यों बैठे उतरे तो क्यों ,यही रवैय्या रहता है .दंगा फसाद में गोली चलाने का आदेश, गृहमंत्री देता है,मतलब आईएस का अफसर,जो मंत्री का सचिव होता है..जो ज़मीनी हक़ीक़त से कभी वाबस्ता हुआ नही...! तो गोली चलायी जाय तो पोलिस पे तफ्तीश..न चले तो 'पोलिस ने दर्शक की भूमिका ली' ये इल्ज़ाम! गर कोई शातिर बलात्कारी , खूनी भी पुलिस कस्टडी मारा जाता है , तो "human rights' वाले 8/10 police वालों का तबादला करा देतें हैं !
    याद होगा 'जेसिका लाल' मर्डर केस!..NGO को प्रसिद्धी मिल जाती है ...! लोग बाग ये भूल जाते हैं , कि ,उस 'व्यक्तीने' अन्य कितने लोगों को पीड़ा पहुचाई थी ..!
    मै इन्हीं 'reforms' की तो बात कर रही हूँ !

    मुंबई ब्लास्ट के बाद ८ माह ATS( Anti terrorist Squad)की पोस्ट खाली रही..क्योंकि, ये नियुक्ती गृहमंत्रालय करता है..मतलब, मंत्री महोदय का सचिव, एक आईएस का अफसर....!
    हालही में एक नगों ने मुंबई में ५००० camera लगानेका प्रस्ताव दिया..सीएम, deputy सीएम..अन्य अफसर हाज़िर थे इस मीटिंग में..रज़ामंदी हो गयी..लेकिन ,चंद्रा ऐय्यंगार नामक,आईएस महिला अफसर ने,बाद में रिपोर्ट दिया," सरकार के पास ये प्रस्ताव है। NGO पैसे donate करे..कैमरे सरकार लगा लेगी...' सो भाड़ में गयी जनता..भाड़ में गए सुरक्षा करमी..आईएस वालों को पुलिस डिपार्टमेन्ट पे अपना अधिपत्य छोड़ना नही है!

    मै इल्तिजा करूँगी,के ये प्रश्न आप 'एक सवाल तुम करो पे' गर उठायें,तो मै,आला अफसरों से इसपे जवाब ले सकती हूँ!
    साभार!

    http://lalitlekh.blogspot.com

    http://shamasansmaran.blogspot.com

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